Friday, August 23, 2013

मुंबई, गैंग रेप के बहाने समाज पर हमला

मुंबई के परेल में फोटो जर्नलिस्ट के साथ गैंग रेप हुआ, महिलाओं के लिए सुरक्षित माने जाने वाले मुंबई शहर के बीचोंबीच वाले इलाके परेल में हुई यह घटना बदलते समाज का वीभत्स और कुत्सित रूप दर्शाती है। जनाक्रोश के बीच पुलिस ने कइयों को डिटेन किया, संभवत: सभी आरोपी पकड़े जाएंगे, कानूनी फिर अदालती कार्रवाई और फिर संभवत: सजा! यह घटना दिल्ली में 12 दिसंबर की घटना जैसी ही थी, फर्क सिर्फ बस का था। दूसरा और अहम फर्क यह कि मुंबई में ऐसा हुआ, जहां देर रात तक वर्किंग विमिंस घरों को लौटती हैं। यह सच है कि परेल के शक्ति मिल्स कंपाउंड का इलाका सूनसान है, लेकिन यहां तो रात एक बजे तक दूर-दराज रहने वाली महिलाएं बेफिक्र हो अकेले अपने घर सकुशल पहुंच जाती हैं।
महिलाओं के लिए दूसरे महानगरों से सुरक्षित मानी जाने वाली मुंबई में कानून-व्यवस्था से ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी यहां के नागरिकों की है। यह वही शहर है, जहां युगल उन्मुक्त हो कहीं भी आते-जाते हैं, इस शहर में ऐसी घटना शर्मिंदगी को भी शर्मसार कर देती है। यहां कोई सोच भी नहीं सकता कि शाम के वक्त ऐसा कुकृत्य हो सकता है। पहले लोग दिल्ली को कोसा करते थे कि वह रेप सिटी बनती जा रही है, लेकिन अब घटिया और घृणित मानसिकता इस कदर समाज को कोढ़ी बनाती जा रही है कि कोई भी जगह सुरक्षित नहीं कही जा सकती!
इस बीच यह भी एक कड़वा सच है कि मुंबई पुलिस रेप की घटना के 24 घंटे बाद भी किसी पुख्ता नतीजे पर नहीं पहुंच पाई, सबकुछ नॉर्मल समझकर किया जा रहा है। दिखावे के लिए आनन-फानन में दर्जनों लोगों को डिटेन किया, कइयों से पूछताछ की गई, एक गिरफ्तारी हुई और बाकी की तलाश जारी है। पुलिस प्रशासन भी समझता है कि कुछ दिन लोग हो-हल्ला मचाएंगे, फिर धीरे-धीरे सभी अपनी जिंदगी की भागमभाग में व्यस्त हो जाएंगे। इस शहर की आदत भी है कि बीती ताहि बिसार देहि, आगे की सुधि लेहि! जी हां, यहां लोग जिंदगी की रफ्तार से दो-चार होते हुए रास्ते में लगने वाले झटकों पर कुछ क्षण बिफरते हैं, फिर आगे बढ़ जाते हैं।
कुल मिलाकर असली परीक्षा आम आदमी (खासकर आम औरत) की है, जिसे अपनी और अपनों की सुरक्षा खुद ही करनी है। अब वह दौर बीत गया, जब हम नारी सम्मान की बातें करते थे। अब वह दौर है, जहां विज्ञापन भी नारी देखकर ही चलते हैं। कॉर्पोरेट सेक्टर में महिलाएं-लड़कियां रखी जाती हैं, ताकि ऑफिस का वर्क कल्चर खुशगवार बना रहे। स्कूल-कॉलेजों तक में फैशन परेड कराई जाती है। और तो और नेटवर्किंग साइट्स पर भी महिलाएं ही ज्यादा लाइक होती हैं। अब वैषयिक चर्चाएं कम और कामुक चर्चाएं ज्यादा होती हैं। हम बात तो सामाजिक पारदर्शिता की करते हैं, जिसमें नारी को समान सम्मान दिए जाने की दुहाई करते हैं, लेकिन सचाई यह है कि मानसिक रूप से पारदर्शिता नारी को उघाडऩे में ज्यादा रहती है। ऐसे में, बदलाव की जरूरत कानून-व्यवस्था, पुलिस-पड़ताल में नहीं, बल्कि मानसिक-सामाजिक क्षेत्र में ज्यादा है, क्योंकि दिल्ली की घटना या मुंबई की घटना घृणित मानसिकता और कुत्सित समाज की ही देन है।
सर्वेश पाठक

Tuesday, August 6, 2013

जिस दर पर पूरी होती हैं मन्नतें

कौमी एकता की मिसाल हज़रत मखदूम फकीह अली माहिमी की दरगाह

  • रमज़ान का पाक महीना, रोज़े का बीसवां दिन और हम जा पहुंचे खुदा का दरजा रखने वाले सूफी की मज़ार पर मत्था टेकने। जी हां, यहां जि़क्र हो रहा है दुनिया भर में मशहूर हज़रत मखदूम फकीह अली माहिमी की दरगाह का। लंबे अरसे से बाबा के दर पर जाने की मंशा थी और जब पहुंचे, तो मानो ज़ुबान को ताला लग गया और भूल गए सारी मन्नतें, सारी ख्वाहिशें। ऐसा लगा, जैसे खुद ब खुद पाक परवरदिगार हमसे रूबरू हो दिल की धड़कने गिन रहा हो। मज़ार की चादर को पलकों से लगाकर मत्था टेका, तो बाबा की प्यार भरी छुअन सिर पर महसूस की। कहते हैं खुदा अपने हर बंदे की खबर रखता है, ऐसे में ऊपर वाले से क्या कहना!

हज़रत मखदूम फकीह अली माहिमी की दर हर मज़हब, हर कौम के लिए एक है और यहां से लौटने वाले की झोली कभी खाली नहीं रहती। दरगाह पर हर खास ओ आम दस्तक देकर खुद को खुशनसीब समझता है। इतिहास का जि़क्र करें, तो हज़रत मखदूम फकीह अली माहिमी की पैदाइश अरब से आकर माहिम द्वीप पर बसे परिवार में सन 1372 ई. (776 हिजरी) में हुई थी। उनके वालिद इराक व कुवैत की सीमा से पहले गुजरात आए, इसके बाद वे मुम्बई के करीब कल्याण पहुंचे, फिर यहां माहिम में आकर बस गए, जहां बाबा मखदूम अली माहिमी पैदा हुए। मखदूम फकीह अली माहिमी बचपन से ही सूफी विचार रखते थे और उन्होंने रहस्यवाद तथा गैर रहस्यवाद के मिलेजुले सिद्धांत को आसान लफ्ज़ों में ढाल आम इंसान तक पहुंचाया। उनकी विद्वता व उदारता उनके ग्रंथों में सहज ही झलकती है। कोकण के नवैत परिवार से जुड़ा होने के नाते उन्हें 'कुतुब-ए-कोकण भी बुलाया गया। स्पेन के विश्व प्रसिद्ध सूफी संत मोइनुद्दीन इबने-ए-अरबी के शागिर्द रहे माहिमी गुजरात के अहमद शाह के शासनकाल में शहर के काजी बने। उनकी शोहरत दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती गई।

मखदूम अली माहिमी देश के पहले टिप्पणीकार बने, जिन्होंने पाक कुरआन को उर्दू व फारसी के सरल शब्दों में ढाला, जिसे दुनिया ने 'तफ्सिर-ए-रहमानी के नाम से नवाज़ा। उनके द्वारा लिखे ग्रंथ की पांडुलिपि की स्याही आज करीब सात सौ साल बाद भी उतनी ही चमकदार है, जो किसी अजूबे से कम नहीं! माहिमी ने उर्दू व अरबी भाषा में करीब बीस ग्रंथ लिखे, जिनमें अदालत-उत-तवहीद, मिरातुल हकीक तथा फिकाह मखदूमी विश्व विख्यात हैं। बाबा के चमत्कारों जुड़े तमाम किस्से दुनिया भर में मशहूर हैं। अरसे से दरगाह की खिदमत में लगे पीर मखदूम साहेब चॅरिटेबल ट्रस्ट के नूर परकार बताते हैं कि बाबा को बकरियों से बहुत प्यार था, एक बार जब बाबा कहीं बाहर गए थे, तो उनके घर एक बकरी का बच्चा अल्लाह को प्यारा हो गया, लौटने पर बाबा को पता चला, तो वे उस जगह पहुंचे, जहां बकरे की लाश पड़ी थी, बाबा ने आसमान में हाथ उठाकर दुआ की और बकरे से बोले उठ! फिर क्या था, बकरा उठ खड़ा हुआ, उस वक्त बाबा नौ साल के थे। ऐसे ही, एक जलसे के वक्त खाने के लिए हर शख्स ने कुछ न कुछ पकाया, फिर बाबा मछली खाकर हाथ धोने पहुंचे और जब उनके हाथ पर पानी डाला गया, तो हाथ में मौजूद मछली के कांटे जिन्दा मछली में तब्दील हो गए।

 ऐसे तमाम किस्से है, जो हर खासो आम के लिए किसी अजूबे से कम नहीं।दरगाह के बारे में यह किस्सा भी प्रचलित है कि अगर किसी को भूत, प्रेत, जिन्न आदि ने घेर रखा है, तो यहां आगे के रास्ते मज़ार जाकर मत्था टेकने और पीछे के रास्ते बाहर निकले से बुरी आत्माओं से पीछा छूट जाता है। यहां तक कि पुलिस वालों की भी बाबा में असीम श्रद्धा है और आला अधिकारी बाबा के हाजिरी जरूर लगाता है। यहां तक कि दिसंबर के दूसरे हफ्ते में शुरू होने वाले उर्स में बाबा की पहली चादर माहिम पुलिस की ओर से चढ़ाई जाती है। इसके पीछे तर्क है कि अंग्रेजी शासनकाल में कोई पुलिसकर्मी मुज़रिम से तंग आकर बाबा से उसे पकड़वाने की मन्नत मांग बैठा और वह पूरी हो गई, तभी से यह परंपरा निकल पड़ी और तब से आज तक पुलिस वालों की तमाम मन्नतें बाबा ने पूरी की हैं। नूर साहब के मुताबिक 28 वें रोजा और 29 वें शब को बाबा के हाथों के लिखे कुरआन-ए-पाक की जियारत (आम आदमी के दर्शन के लिए) कराई जाती है, जिसकी स्याही व कागज अभी भी जस का तस चमकदार है।
सर्वेश पाठक

Sunday, July 14, 2013

शहर को कोसने की बजाय संजोएं

शहर-दर-शहर भटकते-घूमते इन दिनों मुंबई में हूं। शहरों (खासकर पुराने शहर) में एक बात कॉमन होती है कि वहां नई-पुरानी दोनों तस्वीरें छलकती हैं, आधुनिकता के साथ ऊंची इमारतें है, तो तंग गलियों से ललकारती पुरानी यादें भी। सबसे खास बात यह है कि ज्यादातर पुराने शहरों में गंदगी होती ही है। अब मुंबई की बात करें, तो बारिश के दिनों में गंदगी गटर से निकलकर सड़कों गलियों में आ जाती है। यहां की मीडिया अपने तईं यहां के शासन-प्रशासन को जगाने-चेताने की पुरजोर कोशिश कर रही है, ताकि शहर को साफ-सुथरा बनाया जा सके। ज्यादातर पुराने शहरों का कमोबेश यहीं हाल है, जहां मौके-बेमौके गंदगी नजर आ ही जाती है। 
गंदगी और गालियो की बात है तो वो कौन सा पुराना शहर है जहा गंदगी नहीं या जहा लोग गाली-गलौज नहीं करते। गन्दी तो मुंबई भी है, जहा 70 फीसदी आबादी स्लम में रहती है। गन्दी तो दिल्ली भी है, जहा यमुना के आसपास से गुजरने वाले मुह ढक लेते है। क्या आप दिल्ली की यमुना, उज्जैन की शिप्रा में डुबकी लगा सकते है? सही मायने में पुराने शहरो के प्रशाशन और राज्य सरकार को चेताने की जरूरत है, जो यदा-कदा स्थानीय पेपर करते रहते हैं। लेकिन कुछ लोग फेसबुक, ट्विटर जैसे नेटवर्किंग साइट पर शहर का कुत्सित रूप रखने से नहीं चूकते। वे यह नहीं सोचते कि नेटवर्किंग साइट पर अजीबो-गरीब ताना बाना बुनकर likes & hits बटोरे जा सकते है, पर इससे शहर का भला नहीं होने वाला।
अगर हम सही मायने में अपने शहर के लिए कुछ करना चाहते हैं, तो पहली कोशिश यह होनी चाहिए कि अपने तईं गंदगी न फैलाएं और जितना हो सके गंदगी फैलने से रोकें। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है सिविक सेंस, जो हम आधुनिकता की आड़ में खोते जा रहे हैं। सिविक सेंस के साथ अवेयरनेस की जुगलबंदी कर अगर सभी अपने-अपने शहरों की सचमुच सफाई में जुट जाएं, तो भला कौन रोक सकता है आबोहवा बदलने से..!

Sunday, October 4, 2009

चुनावी चाशनी में मुद्दों की तासीर

जैसे-जैसे महाराष्ट्र में चुनाव की तारीख करीब आ रही है, मुद्दे बनाने और उन्हें लपकने की होड़ मची हुई है। इसी बीच, करण जौहर की फिल्म 'वेकअप सिड रिलीज हुई, तो राज ठाकरे की पार्टी मनसे को ज्वलंत मुद्दा मिल गया। फिल्म में मुम्बई को बॉम्बे बोला गया है, फिर क्या था! जगह जगह शुरू हो गया, फिल्म का विरोध! हड़बड़ाहट में करण जौहर भी जा पहुंचे राजा साहेब के दरबार मत्था टेकने। उन्होंने बाकायदा माफी मांगकर मामले को रफादफा किया। इसके बाद हर पार्टी को मौका मिल गया, शिवसेना ने कहा सिर्फ राज ठाकरे से माफी मांगने से नहीं चलेगा, समूचे महाराष्ट्र से माफी मांगो। मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण कहने लगे, राज से माफी मांगने का मतलब ही नहीं था। कानून व्यवस्था के लिए सरकार है, लेकिन मुख्यमंत्री महोदय शायद यह भूल गए कि अभी साल भर पहले ही मनसे ने परप्रांतीय के मुद्दे पर जमकर आक्रामकता दिखाई थी और पुलिस प्रशासन, कानून व्यवस्था धरी की धरी रह गई थी। सड़क पर उतरी राजनीतिक गुंडागर्दी ने आम आदमी को मुश्किल में डाल रखा था और लोगबाग, टैक्सी-रिक्शा वाले पुलिस के सामने ही पिटते देखे गए। ऐसे में, करण जौहर अगर राजा साहेब के दरबार में माफी मांगने पहुंच गए, तो क्या अपराध कर दिया। अब तो आम आदमी भी समझने लगा है कि यदि इस शहर में सुकून से रहना है, तो राजा साहेब की छत्रछाया जरूरी है, क्योंकि कानून व्यवस्था की माथापच्ची से अच्छा है राज ठाकरे से गुहार लगाना। भले ही, वेकअप सिड परदे पर चले न चले, लेकिन करण के राज ठाकरे से माफी मांग लेने से फिल्म का प्रदर्शन बेखटके चल रहा है। राजा साहेब भी उदार हैं, जिन्होंने माफी मांगते ही फिल्म चलने दी और उन्हें फिल्म के डायलॉग में मुम्बई को बॉम्बे कहने पर भी एतराज नहीं है।
सर्वेश पाठक

Monday, September 28, 2009

विजय रावण की!

देश भर ने विजय दशमी मनाई, मुम्बई भी रावण का पुतला जलाने में पीछे नहीं रही। लेकिन, हर साल की तरह इस बार भी वहीं यक्ष प्रश्न कितने रावण जलाओगे- ग्लोबल वार्मिंग से लेकर ग्लोबल रिशेसन तक, पड़ोसी (देशों) की टेनशन से लेकर टेरेरिज्म तक, महंगाई से लेकर तनहाई तक, बीमारी से महामारी तक, राजनीति से समाज तक, साहित्य से पत्रकारिता तक, अर्श से फर्श और जीवन के उत्कर्ष (लिंग जांच व भ्रूण हत्या) तक हर डग पर रावण की दहाड़ व धमक महसूस की जा सकती है। फिर भी, हम कहते हैं कि हमने बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मना लिया है, रावण को जला दिया है।
सर्वेश पाठक

Tuesday, September 22, 2009

गूंजा महाराष्ट्र में चुनावी बिगुल

जैसे जैसे राजनीतिक दल गठबंधन व प्रत्याशियों की औपचारिक घोषणा करते जा रहे हैं, वैसे वैसे महाराष्ट्र में चुनावी सरगर्मी तेज हो रही है। कुछ खुशी में नाम घोषित होते ही प्रचार में जुट गए, तो कुछ पार्टी का बैनर न मिलने से नाराज हो बगावत पर उतर आए। हर किसी को गठबंधन और मोर्चे की दरकार है। पार्टी का टिकट न मिलने से पिछले दिनों कुछ लोगों ने वरिष्ठ शिवसेना नेता के यहां हल्ला बोल दिया, तो कइयों ने अपनी पार्टी ही बदल दी। अभी 13 अक्टूबर को चुनावी महासंग्राम होना है, ऐसे में महाराष्ट्रीयन जनता का महाऊंट किस करवट बैठेगा, यह कहने में बड़े बड़ों को पसीने आ रहे हैं। पिछले चुनाव में राज ठाकरे की सेना को हल्के में लेने वाले बड़े राजनेता, विश्लेषक और टिप्पड़ीकार इस विधानसभा चुनाव में पांडित्य से बचने की कोशिश में हैं। खैर, हम भी सयाने नहीं बनेंगे और इंतजार करेंगे चुनाव के दिन व वोटों की गिनती का !
सर्वेश पाठक

Sunday, April 26, 2009

पीएम पर जूता, निशाना चूका

विरोध प्रगट करने के लिए अमरीकी राष्टï्रपति पर इराकी पत्रकार द्वारा फेंका गया जूता हमारे देश में जूतमपैजार का रूप ले चुका है। यह बीमारी कई नेताओं से होते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक पहुंच चुकी है।
पहले तो यह विरोध का तरीका कुछ समझ में भी आया, लेकिन अब तो जिसे देखो, जहां देखो, जिस किसी पर देखो...जूता फेंकते नजर आ जा रहा है। क्या यही सही तरीका है, विरोध जताने का...
यहां तक तो ठीक है कि राजनेता किसी के नहीं होते, लेकिन हमारी अपनी भी तो एक संस्कृति, एक मर्यादा और सामने वाले की भी एक पद की गरिमा है। कम से कम सस्ती लोकप्रियता और ओछे प्रचार से निकलकर हमें गंभीरता से इस अछूत कृत्य को रोकना चाहिए, वर्ना यह जूता विरोध प्रदर्शन की सीमा से निकलकर जहां, तहां सामान्य चर्चा सत्रों व आम बैठकों में भी नजर आने लगेगा। आप भी अपनी राय दर्ज कराएं...

Wednesday, November 26, 2008

एक बार फ़िर रक्त रंजित हुयी मुंबई ...

मुंबई। ना जाने इस शहर की फिजां कैसी है कि किसी ना किसी की नजर हमेशा ही इसे लगी रहती है, कभी पानी तो कभी प्रांतवाद तो कभी आतंकवाद ... लेकिन इस बार जो खूनी नज़र आतंकवाद ने मुंबई को लगाई वो इतिहास के पन्नों पर देश के सबसे बड़े फियादीन हमले के तौर पर याद की जाएगी।
अगर खबरों में जायें, तो इस घिनौने कृत्य को कोई नकार नहीं सकता, जिसमें दर्जनों लोगों ने जानें गवायीं और सैकडों लोग घायल हो गए। इतना ही नहीं इस हमले ने देश में सबसे तेज तर्रार कार्रवाई के लिए जानी जाने वाली मुंबई एटीएस के मुखिया hemant karkare सहित कई पुलिस अधिकारियों को मौत की नींद सुला दी।
हर बार का हमला भयावह से भी ज्यादा भयावहता की पराकाष्ठा लिए हुए रहा, लेकिन फ़िर भी ना तो सरकार और ना ही सुरक्षा एजेंसियां अभी तक चेत पायीं हैं। सुबह होते ही सभी पार्टियों के नेता बयान देना और एक दूसरे पर आरोपों - प्रत्यारोपों का दौर शुरू कर देंगें।
खैर, हम लोगों ने भी अपने अखबार के लिए खबरें दीं और अब देश के मौजूदा हालत पर बहस छेड़ दी है । लेकिन, शायद अब हालत कंट्रोल से बाहर जा चुके हैं और आम आदमी भी इन धमाकों और ऐसे विवादों का मानों आदी हो चुका है । मैंने मुंबई ट्रेन ब्लास्ट के बाद की मुंबई के भी अनुभव लिए हैं, लेकिन उस समय तक शायद यहाँ कि संस्कृति जिंदा थी, क्योंकि उस हादसे का सामना मुंबई वालों ने मिल कर किया था । जबकि, आज की मुंबई तो राज की मुंबई है, जिसमे प्रान्त वाद और भाषा वाद का जहर घुला हुआ है। ऐसे में, जब हम विभिन्न राजनितिक मुद्दों में उलझ गए हैं और देशवासी ना होकर प्रान्त और भाषा वासी बन चुके हैं, तो टेरेरिस्ट भाई लोग तो फायदा उठाएंगे ही ना ... हम शायद ये भी भूल गए हैं कि ऐसे ही एक बार हमारी फूट का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने हम पर सैकडों साल राज किया ... तो अब नाराजगी किससे है अब हमें अगले और इससे भी बड़े हमले के लिए तैयार रहना चाहिए।

आपकी प्रतिक्रियायों की प्रतीक्षा में ...
आपका,
सर्वेश ...
(रात के तीन बजे मुंबई से )

Sunday, November 23, 2008

नया रंग लाएगी चाचा भतीजा की मुलाक़ात


आखिरकार लंबे इन्तजार के बाद चाचा बाल ठाकरे और भतीजा राज ठाकरे के बीच मुलाकात हो ही गयी। बहाना कुछ भी हो लेकिन उद्देश्य दोनों का एक ही है , महाराष्ट्र और मराठी। जल्द ही भविष्य की गर्त से कोई ख़बर निकलेगी, जो मुंबई और महाराष्ट्र की सामाजिक और राजनैतिक गतिविधियों में बदलाव लेकर आएगी... हालाकि, झेलना तो हर हाल में आम आदमी को होगा, चाहे वो हिन्दी भाषी हो या मराठी।

खबरों के मुताबिक, बाल ठाकरे ने राज को एसएमएस भेजा था और उसके बाद वह चाचा से मिलने के लिए मातोश्री पहुंचे। राज ने मुलाकात के दौरान बाल ठाकरे के स्वास्थ्य के बारे में उनसे पूछा। माना जा रहा है कि जिस समय राज मातोश्री पहुंचे, उस वक्त उनके चचेरे भाई उद्धव भी वहां मौजूद थे। तो, जनाब इन्तजार कीजिए कि नया उत्पात कब शुरू होगा।

Monday, January 21, 2008

मुझे भी चाहिए भारतरत्न

आज जिधर देखिए उधर ही हर कोई मुह उठाए खडा कि उसे भारतरत्न चाहिए, तो जनाब मे सोच रहा हूँ कि क्यों ना इस मौक़े का फाइदा उठाया जाय.
...और ये समस्या मेरी ही नही शायद आपकी भी हो, तो आप भी आमंत्रित हैं इस प्रतिस्पर्धा में और अब आप भी अपने लिए बयानबाजी शुरू कर दिजीए साथ ही अपने पक्ष में जनमत भी जुटाना शुरू कीजिए ! जी हाँ, आज भारत रत्न पाना प्रतिस्पर्धा का ही विषय है कोई इसे राजनीतिक रंग देने में जुटा है तो कोई इसे फिल्मी रंग देने पर आमादा है, तो जनाब हम और आप क्यों पीछे रहें !
इस साल भारत रत्न के लिए जहाँ बीजेपी ने अटलजी का झंडा बुलंद किया तो मायावती भी कांशीराम को मरणोपरांत भारत रत्न दिलाने के लिए हुंकार भरने लगीं, फिर क्या था एक के बाद एक धडाधड़ भारत रत्न लेने वालों की होड़ लग गई और फिल्म इंडस्ट्री के लोगों ने भी इसी लगे अपनी भारत रत्न पाने की चाह व्यक्त कर डाली, हांलाकि फिल्म वालो के लिए पहले ही भारत रत्न जैसा पुरस्कार यानी दादासाहेब फाल्के अवार्ड मौजूद है और उसे पाने के लिए तो हम और आप मारामारी नहीं करते, फिर क्यों हर किसी को चाहिए " भारत रत्न " ...!
shesh ke liye samay chahie

Sunday, November 25, 2007

भोपाल का राज एक्सप्रेस, पत्रकारिता के नए अनुभव

जब इंसान खाली होता है तो उसके दिमाग में बेमतलब के फितूर आना स्वाभाविक है, ऐसा ही आजकल कुछ मेरे साथ हो रहा है, मैंने सोचा क्यों ना कुछ पत्रकारिता सम्बन्धी चर्चा कर ली जाए !
मेरे द्वारा पत्रकारिता की चर्चा हो और भोपाल का जिक्र ना आए ऐसा कैसे हो सकता है, वह भी उन स्थितियों में जब भोपाल से मेरा कुछ खास ही लगाव हो ? जी हाँ भोपाल एक ऐसा शहर है जहाँ कला संस्कृति के अलावा पत्रकारिता का भी अपना एक अलग ही अंदाज है और फिर भोपाल और पत्रकारिता तो मानों एक दूसरे के पूरक ही हैं !
अब भोपाल और पत्रकारिता का जिक्र चले और राज एक्सप्रेस को नजरंदाज़ कर दिया जाए तो ऐसा कैसे हो सकता है जनाब, क्योकि राज एक्सप्रेस ही तो आधुनिक पत्रकारिता और हर रोज नए नए बदलाव करने वाली पत्रकारिता का दर्पण है, फिर मैनें तो वहा पूरे डेढ़ साल मगज मारी की है और राज एक्सप्रेस से काफी कुछ नया सीखा है ॥ राज एक्सप्रेस में हर रोज नए प्रयोगों का अंदाजा तो इसी बात से लगाया जा सकता है की इस अखबार ने महज एक साल में पांच संपादकों को देखा है, जो भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में शायद ही पहले कभी हुआ हो ..और इतना ही नहीं, आज भी वहाँ परिवर्तन का दौर जारी है॥ आज भी राज एक्सप्रेस में नवोदितों के लिए नए प्रयोग करते रहने की भरपूर छूट है ॥ इसके अलावा संपादकों का बदलना तो आज भी बदस्तूर जारी है और इस समय शायद शीतल जी वहाँ का कार्यभार संभाले हुए हैं, जो पहले भोपाल के नवभारत और फिर यूपी के अमर उजाला की सैर कर चुके हैं ॥ इसके अलावा राज एक्सप्रेस के मालिक और एमडी अरुण सह्लोत जी के भी हिम्मत की दाद देनी होगी, जिन्होंने पत्रकारिता का क, ख, ग भी नहीं जानने के बावजूद और एक बिल्डर की हैसियत से इस अखबार की शुरुआत की और वहाँ पहले से स्थापित व सुविख्यात दैनिक भास्कर समूह को कड़ी चुनौती दे डाली॥ लेकिन, अखबार में नित नए बदलावों के चलते वहा भर्ती होने वालों के एक पैर संस्था में और दूसरा बाहर ही रहा, फिर भी इससे अखबार की सेहत पर कुछ खास असर नहीं पडा॥
हालांकि, राज एक्सप्रेस की खूबियों का बखान इतना आसान नहीं कि उन्हें पल भर में बयान कर दिया जाए इसके लिए एक बार फिर मुझे आपके सामने की-बोर्ड पर हाथ चलाना होगा लेकिन फिलहाल अगली पंक्ति के लिए कुछ समय चाहिए क्योकि खाली व्यक्ति सबसे अधिक व्यस्त होता है !

Monday, November 19, 2007

बीपीओ कंपनियों का मिशन विलेज

बीपीओ कंपनियां अब गांवों का रुख कर रही हैं। इसकी वजह बड़े शहरों में रीयल एस्टेट की बढ़ती लागत और नौकरी छोड़ने वालों की तादाद में हो रही बढ़ोतरी है। सत्यम कंप्यूटर जैसी कंपनियां अपनी प्रॉडक्टिविटी बरकरार रखने के लिए बीपीओ यूनिटों को ग्रामीण इलाकों में भेज रही हैं।

सत्यम लेजान और डेटामेशन जैसी आईटी कंपनियां आंध्र प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में पहले ही अपने बीपीओ सेंटर खोल चुकी हैं। ये सेंटर ग्रामीण इलाकों के लोगों को रोजगार देने के अलावा इन कंपनियों को कारोबार के अच्छे अवसर भी प्रदान करते हैं।

सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज के प्रमुख (ग्राम आईटी और हाई एंड सर्विसेज) रवि कुमार मेदुरी का कहते हैं कि शहरी बीपीओ के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में ऑपरेटिंग कॉस्ट 50 फीसदी से भी कम है। साथ ही शहरी लोगों के मुकाबले ग्रामीण कर्मचारियों की प्रॉडक्टिविटी ज्यादा है।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में बीपीओ केंद्र स्थापित करने की लागत शहरी क्षेत्र के मुकाबले दो वजहों से कम होती है। बुनियादी ढांचा और रोजगार की लागत।

सत्यम की योजना 2008 तक पूरे देश के ग्रामीण इलाकों में 10 और सेंटर स्थापित करने की है। एक अन्य बीपीओ फर्म डेटामेशन अगले साल तक इन इलाकों में 15 बीपीओ सेंटर खोलेगी। अलबत्ता आईटी इंडस्ट्री संगठन नैस्कॉम ने रूरल बीपीओ सेंटरों के बारे में आशंका जताई है।

Monday, August 27, 2007

जिगर मा बड़ी आग है..!


हाल ही में हुए हैदराबाद में भीषण बम विस्फोटों ने ४० से अधिक जानें ली हैं, लेकिन अपने शांतिदूत प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह के कानों तक शायद इन धमाकों की धमक नहीं पहुंच पा रही है।

देश में धमाकों की संख्या बढती जा रही है लेकिन सरकार की तो मानों नीद ही नहीं टूट रही ऐसे में पकिस्तान के साथ साथ बांग्लादेशियों के भी सिर उठने लगे हैं । देश में बंग्लादेशी आतंकियॉ की वारदातें बढ़ती जा रही हैं लेकिन सरकार ने जैसे चेतावनी तक नहीं देने की क़सम खा रखी है।

हां, यहाँ एक बात अवश्य है कि आतंकियों को काफी सहूलियत हो गयी है और भारत उनके लिए एक बेहतर आरामगाह और उनकी दुकान बढ़ाने वाला देश साबित हो रहा है। अब उन्हें कहीं छिपने बचने या किसी से डरने की आवश्यकता नहीं रही, वो आराम से आज़ाद भारत में पूरी आजादी के साथ दहशत फैला सकते हैं और कभी मुम्बई कभी दिल्ली कभी बनारस तो कभी हैदराबाद को निशाना बना सकते हैं।

लेकिन आतंकिओं से एक चूक ज़रूर हो गयी की उनके द्वारा संसद पर किया गया हमला नाकाम हो गया वरना देशवासियों को अगली सरकार चुनने में कम तकलीफ होती क्योंकि उम्मीदवार जो कम बचते...! बल्कि ये भी हो सकता है की भाई बिरादारों पर दया आ गयी हो और उन्होंने अपने भाईयों को ना मारने का फैसला कर लिया हो, जिससे शायद संसद पर हमला नाकाम रह गया हो या आतंकियों ने खुद हमला नाकाम कर दिया हो..!

खैर..! आतंकियों का खुदा उन्हें सदबुद्धि दे की वो अगली बार जब संसद पर हमला कराएं तो वो हमला ज़रूर सफल हो..!

Saturday, August 18, 2007

सरहदें नहीं जानता साहित्य...



पाकिस्तान में हिन्दी भाषा के जानकार दूर-दूर तक नहीं मिलेंगे, लेकिन अनूदित हिन्दी साहित्यिक पुस्तकों और मासिक पत्रों को पढ़ने वाले कई मिल जाएँगे। कराची में हिन्दी भाषा सीखने में भी लोगों की रुचि धीरे-धीरे बढ़ रही है। कराची में हिन्दी उपन्यास, लघु-कहानी और आत्मकथा का उर्दू भाषा में अनुवाद किया जाता है। भारतीय लेखक निर्मल वर्मा, उदय प्रकाश, प्रेमचंद, रमेश बख्शी और गीतांजलीश्री लोकप्रिय हैं।सिटी प्रेस के मालिक और हिन्दी उपन्यास और लघु-कहानियों का उर्दू में अनुवाद करने वाले अजमल कमाल का कहना है कि हिन्दी साहित्य और विशेष रूप से हिन्दी उपन्यास बहुत बेहतरीन और प्रभावशाली होते हैं। उन्होंने बताया कि मैं हर महीने भारत से साहित्यिक पत्रिका 'तदभव' मँगवाता हूँ और यहाँ उसका उर्दू भाषा में अनुवाद करता हूँ। इस पत्रिका को कराची में बहुत पसंद किया जाता है।अजमल ने बताया कि उन्होंने भारतीय लेखक उदय प्रकाश की बहुत सी किताबें उर्दू में अनुवाद करके छापी हैं। वे अपनी साहित्यिक पत्रिका 'आज' में भी हिन्दी लघु-कहानियों का अनुवाद करके शामिल करते हैं।हिन्दी भाषा से उर्दू में अनुवाद करने वाले आमिर अंसारी ने कहते हैं कि मैंने हिन्दी की काफी किताबों का उर्दू में अनुवाद किया है। मैंने यशपाल के उपन्यास 'झूठा सच' का उर्दू में अनुवाद किया था जो कराची के बाजारों में बहुत बिका। उन्होंने बताया कि उन्होंने ही निर्मल वर्मा की हिन्दी की लघु कहानियों के पूरे वॉल्यूम का अनुवाद किया था, जो सिटी प्रेस ने छापा था और लोगों ने बहुत पसंद किया। कराची में किताबों की सबसे बड़ी मार्केट 'उर्दू बाजार' में अली बुक स्टोर के मालिक शहजाद ने बताया कि बहुत से पाठक हिन्दी उपन्यास और लघु-कहानियों की माँग करते हैं, जिनका उर्दू में अनुवाद किया हुआ होता है। उन्होंने बताया कि आजकल दुकानों पर प्रेमचंद और उदय प्रकाश जैसे लेखकों की पुस्तकें अधिक बिकती हैं। हिन्दी साहित्य के पाठक अब्दुल वहीद ने कहते हैं कि मैं तो हिन्दी साहित्य का दीवाना हूँ और मैंने हाल ही में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविताएँ और यशपाल का 'झूठा सच' उपन्यास पढ़ा है।वहीद ने हिन्दी-उर्दू बोल-चाल पर किताब खरीदते हुए बताया कि उन्हें हिन्दी भाषा सीखने का बहुत शौक है इसलिए वे यह किताब खरीद रहे हैं। हिन्दी प्रेमी- उर्दू बाजार में ही वेलकम बुक स्टोर के निसार अहमद ने बताया कि जब से पाकिस्तान और भारत के बीच संबंध ठीक हुए हैं और थार एक्सप्रेस चलने से दोनों देशों के लोगों का आना-जाना शुरू हुआ है, तब से कराची के लोगों में हिन्दी भाषा सीखने की रुचि बढ़ी है। उनका कहना था कि हमारी दुकान पर अधिकतर लोग हिन्दी-उर्दू बोलचाल और हिन्दी-उर्दू शब्दकोश खरीदने आते हैं। मजेदार बात यह है कि उनमें बड़ी संख्या युवकों की होती है। उन्होंने कहा कि आजकल राजा राजेश्वर का 'हिन्दी-उर्दू शब्दकोश' बहुत बिक रहा है, जिसको 'अन्जुमने तरक्की उर्दू' कराची ने छापा है। बुक स्टोर पर राजेश्वर का शब्दकोश खरीदते हुए एक नौजवान फराज ने बताया कि हमारे रिश्तेदार उत्तर प्रदेश और दिल्ली में रहते हैं और मेरा परिवार हर साल भारत जाता है। एक-दो बार मैं भी गया हूँ और इसलिए मन में इच्छा है कि हिन्दी भाषा बोलूँ और ठीक तरीके से लिखूँ। फराज का कहना था कि भारत एक बहुत बड़ा लोकतांत्रिक देश है और वह तेजी से विकास की ओर बढ़ रहा है। भारत बहुत जल्द विश्व के विकसित देशों की सूची में आ जाएगा और वहाँ रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। फराज का कहना था कि मैं इसलिए थोड़ी बहुत हिन्दी सीख रहा हूँ, ताकि मुझे वहाँ काम करने में कठिनाई न हो।


Wednesday, August 1, 2007

भावनाओं के साथ नृशंस खिलवाड़


साथियों,
आज-कल Tv चैनलों पर एसएमएस के जरिए कई प्रकरणों पर लोगों की राय मांगी जाती है, चाहे वो सूरज का गड्ढे में गिरने का मामला हो या १२ साल के बच्चे को चोर बता कर शहर भर में सार्वजनिक तौर पर शर्मशार करने और पीटने का मामला अथवा ताज को विश्व के सात आश्चर्यों में शामिल किए जाने का मामला।

अब सवाल ये उठता है कि क्या इस तरह कि ख़बरों से सनसनी फैला कर वास्तव में देश, समाज या व्यक्ति का भला हो रहा है अथवा सच में देश गौरवान्वित हो रहा है या नहीं, या फिर टेलीफोन कंपनियों से सौदेबाजी कर कमाने खाने का जुगाड़। लेकिन, दोनों ही स्थितियों में यह भावनात्मक तौर पर अत्यंत खतरनाक है, क्योंकि इन घटनाओं से एक ओर जहाँ हमारी संस्कृति को ठेस पहुँचती है, वहीं देश और समाज को भी शर्मशार होना पड़ता है।

जबकि, दूसरी स्थिति में अगर यह अपनी जेब भरने का मामला हो, तो यह देशवासियों की भावनाओं के साथ खतरनाक खिलवाड़ ही तो है। क्योंकि, भारत की पहचान आज भी दुनियां में एक सहृदयी राष्ट्र की है, जहाँ ज़्यादातर लोग भावनाओं के वशीभूत हो फैसले करते हैं।

ऐसे में, कुछ लोग चंद रुपयों के खातिर हमारे देश व समाज की भावनाओं के साथ नृशंस खिलवाड़ करते हैं, जो आने वाले समय की भयावहता का संकेत देता है। यदि समय रहते इस तरह की गतिविधियों के प्रति सतर्क नहीं हुआ गया, तो वह दिन दूर नहीं जब हम भी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को पार कर इन्हीं नृशंसों की श्रेणी में शामिल हो जाएंगे।

तो इस मुद्दे पर आपका क्या कहना है...?

आप अपने विचारों से हमें तत्काल अवगत कराएं, साथ ही हमें इस लेखनी को प्रभावी बनाने संबंधी सुझाव भी भेजें.... । ...आपका,

सर्वेश...

Tuesday, July 24, 2007

सादर आमंत्रण


mumbai, 25 july -


दोस्तो, यह ब्लॉग आपका अपना ब्लॉग है, जिसे आपकी संवेदनाओं को ध्यान में रख कर तैयार करने कि कोशिश की गयी है। यदि, आपके लिहाज़ से इसमें कुछ कमियां हो, तो आपके सुझाव आमंत्रित हैं।

आपका...

सर्वेश...

जेल से बाहर निकली मोनिका बेदी



Hyderabad, 25 July -


Monica Bedi, former Bollywood actress, and companion to gangster Abu Salem, has been released from Chenchalguda Jail in Hyderabad. A special CBI court in Hyderabad granted her bail on Tuesday.This comes in the wake of the Supreme Court relaxing her bail conditions on Monday, cancelling her passport. Bedi was granted bail by the Supreme Court in May last year with respect to the passport forgery case in Andhra Pradesh. The Bhopal court in Madhya Pradesh, where she faced a similar charge, acquitted her last week.

Sienna Miller ‘shell-shocked’ by poverty in India


Sienna Miller ‘shell-shocked’ by poverty in India

London, July 23: Brit star Sienna Miller was shocked at the extent of poverty in India, during her recent visit as an ambassador for Global Cool.

The 25-year-old who is set to do her bit on spreading environmental awareness revealed that she was ‘shell-shocked’ to see the Bandra Kurla slum in Mumbai.

“I’m feeling a bit shell-shocked. It was unbelievable to see poverty on that scale, especially as it was combined with such a sense of togetherness. There were all these children running around, giving us hugs and asking our names,” Timesonline quoted Miller, as saying.

The actress insisted that she felt ‘sick’ sitting in the luxurious Taj Lands End hotel knowing the condition of the people suffering in the slums.

“What’s scary is that the river flooded two years ago and if it floods again the entire slum will be submerged. God forbid, because the water is ridden with disease and filth. Now I’m back here in the hotel with the air-conditioning and the elevators and the room service, I’m feeling completely sick,” she said.

Saturday, July 21, 2007


hi...
welcom to my blog.

Monday, July 16, 2007

your hearts...


Dear Friends...

When we were using our hearts more than our brains, even for scientifically brainy activities like 'thinking' and 'deciding'...

When we were crying and laughing more often, more openly and more sincerily...

When we were enjoying our present more than worrying about our future...

When being emotional was not synonymous to being weak...

When sharing worries and happinesses didn’t mean getting vulnerable to the listener...

When blacks and whites were the favourite colors instead of greys...

When we miss our chieldhood friends....

Than we wants to some body for shareing our emotions, therefore try to reach here & share everething who's you thinking about your turely hearts, dream or embition.