
मुंबई। ना जाने इस शहर की फिजां कैसी है कि किसी ना किसी की नजर हमेशा ही इसे लगी रहती है, कभी पानी तो कभी प्रांतवाद तो कभी आतंकवाद ... लेकिन इस बार जो खूनी नज़र आतंकवाद ने मुंबई को लगाई वो इतिहास के पन्नों पर देश के सबसे बड़े फियादीन हमले के तौर पर याद की जाएगी।
अगर खबरों में जायें, तो इस घिनौने कृत्य को कोई नकार नहीं सकता, जिसमें दर्जनों लोगों ने जानें गवायीं और सैकडों लोग घायल हो गए। इतना ही नहीं इस हमले ने देश में सबसे तेज तर्रार कार्रवाई के लिए जानी जाने वाली मुंबई एटीएस के मुखिया hemant karkare सहित कई पुलिस अधिकारियों को मौत की नींद सुला दी।
हर बार का हमला भयावह से भी ज्यादा भयावहता की पराकाष्ठा लिए हुए रहा, लेकिन फ़िर भी ना तो सरकार और ना ही सुरक्षा एजेंसियां अभी तक चेत पायीं हैं। सुबह होते ही सभी पार्टियों के नेता बयान देना और एक दूसरे पर आरोपों - प्रत्यारोपों का दौर शुरू कर देंगें।
खैर, हम लोगों ने भी अपने अखबार के लिए खबरें दीं और अब देश के मौजूदा हालत पर बहस छेड़ दी है । लेकिन, शायद अब हालत कंट्रोल से बाहर जा चुके हैं और आम आदमी भी इन धमाकों और ऐसे विवादों का मानों आदी हो चुका है । मैंने मुंबई ट्रेन ब्लास्ट के बाद की मुंबई के भी अनुभव लिए हैं, लेकिन उस समय तक शायद यहाँ कि संस्कृति जिंदा थी, क्योंकि उस हादसे का सामना मुंबई वालों ने मिल कर किया था । जबकि, आज की मुंबई तो राज की मुंबई है, जिसमे प्रान्त वाद और भाषा वाद का जहर घुला हुआ है। ऐसे में, जब हम विभिन्न राजनितिक मुद्दों में उलझ गए हैं और देशवासी ना होकर प्रान्त और भाषा वासी बन चुके हैं, तो टेरेरिस्ट भाई लोग तो फायदा उठाएंगे ही ना ... हम शायद ये भी भूल गए हैं कि ऐसे ही एक बार हमारी फूट का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने हम पर सैकडों साल राज किया ... तो अब नाराजगी किससे है अब हमें अगले और इससे भी बड़े हमले के लिए तैयार रहना चाहिए।
आपकी प्रतिक्रियायों की प्रतीक्षा में ...
आपका,
सर्वेश ...
(रात के तीन बजे मुंबई से )
3 comments:
wah, sarvesh babu.. badhiya hai.. tum to aaj tak se bhi tej nikle...
बहुत दुखद हादसा है। सच है जिन लोगो के परिवार वाले मारे गए होगें उन का यह जख्म कभी नही भरेगा।कुछ कहते नही बन पा रहा।
Jai hind....pura desh ek hai...
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